Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर जानें ये रोचक बातें

Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की आज पुण्यतिथि है। बाल गंगाधर तिलक भारत के प्रमुख नेता, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और लोकप्रिय नेता थे। उनके नाम के आगे ‘लोकमान्य’ लगाया जाता है, ये वह ख्याति है जो बाल गंगाधर तिलक ने अर्जित की थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ही सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थीं। इसलिए उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक कहा जाता है। ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ ये नारा देने वाले भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायक बाल गंगाधर तिलक हैं। बाल गंगाधर तिलक सिर्फ एक लोकप्रिय नेता ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृत, हिंदू धर्म, गणित और खगोल विज्ञान जैसे विषयों के विद्धान भी थे। वैसे तो उनका पूरा जीवन ही आदर्श है। भारत के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है, लेकिन बाल गंगाधर तिलक के लोकमान्य बनने का सफर और कदम बहुत रोचक रहा। बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि के मौके पर जानें उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातें।

बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 13 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। तिलक के पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था। वह संस्कृत के विद्वान और प्रख्यात शिक्षक थे। वहीं उनकी माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। तिलक का विवाह तपिबाई नाम की कन्या से 1871 में हुआ था, जिनका नाम शादी के बाद सत्यभामा हो गया।

बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा

पिता खुद संस्कृत के विद्वान थे, ऐसे में बाल गंगाधर तिलक की पढ़ाई में बहुत निपुण और ज्ञानी थे। पिता का रत्नागिरि से पुणे स्थानांतरण हुआ तो तिलक का दाखिला भी पुणे के एंग्लो वर्नाकुलर स्कूल में करा दिया गया। 16 साल में ही माता और फिर पिता के देहांत के बाद तिलक ने अपने संघर्षपूर्ण करियर की शुरुआत की। 1877 में तिलक ने पुणे के डेक्कन कॉलेज से संस्कृत और गणित विषय की डिग्री हासिल की। उसके बाद मुंबई के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी पास किया। आधुनिक शिक्षा हासिल करने वाली पहली पीढ़ी के भारतीय युवाओं में तिलक को प्रथम माना जा सकता है।

तिलक का करियर

पढ़ाई पूरी करने के बाद तिलक पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और अंग्रेजी की शिक्षक बन गए। हालांकि स्कूल के अन्य शिक्षकों से मतभेद के बाद 1880 में उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया। तिलक अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे। स्कूलों में ब्रिटिश विद्यार्थियों की तुलना में भारतीय विद्यार्थियों के साथ हो रहे दोगले व्यवहार का विरोध करते थे। तिलक ने समाज में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ भी आवाज उठाई।

आजादी के लिए तिलक के प्रयास

बाद में तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारत में शिक्षा का स्तर सुधारना था। इसके अलावा मराठी भाषा में तिलक ने मराठा दर्पण और केसरी नाम से दो अखबार भी शुरू किए, जो उस दौर में काफी लोकप्रिय हुए। स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनते हुए तिलक ने अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया और ब्रिटिश सरकार से भारतीयों को पूर्ण स्वराज देने की मांग की। उनके अखबार केसरी में छपने वाले लेखों की वजह से तिलक कई बार जेल गए। अपने प्रयासों के कारण तिलक को ‘लोकमान्य’ की उपाधि से नवाजा गया। एक अगस्त 1920 में लोकमान्य तिलक ने अपनी आंखें मूंद ली।

Source Amar Ujala

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